द्रवीभूत प्रार्थना

ईश्वर, मुझे और द्रवीभूत करो— इतना पारभासी कि मुझमें झाँकने वाली हर कुटिल आँख, परछाईं…

आग

लेखिका :-   शुचि मिश्रा बताते थे बुजुर्ग कुछ ऐसे-ऐसे  आ…

ऋण-बोध

वह कोई महाकाव्य नहीं थी जिसे सस्वर पढ़ा जाता, वह तो घर के पुराने संदूक में दबी एक मूक…

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