मेरी मां की साड़ी

' मां ' माँ  के बारे में मैं क्या ही लिखूं..  मैं ही नहीं , दुनिया की कोई भी कलम मां का …

द्रवीभूत प्रार्थना

ईश्वर, मुझे और द्रवीभूत करो— इतना पारभासी कि मुझमें झाँकने वाली हर कुटिल आँख, परछाईं…

आग

लेखिका :-   शुचि मिश्रा बताते थे बुजुर्ग कुछ ऐसे-ऐसे  आ…

ऋण-बोध

वह कोई महाकाव्य नहीं थी जिसे सस्वर पढ़ा जाता, वह तो घर के पुराने संदूक में दबी एक मूक…

ज़्यादा पोस्ट लोड करें
कोई परिणाम नहीं मिला