लिखने बैठी जब अपने
भीतर के मर्म को,
पहला सवाल उठा क्या मैंने सच में क्षमा किया उन्हें
जो मेरे भरोसे की जड़ें काट गए थे?
या विष का कण अब भी मेरी स्मृति के गहरे तल में
एक पीड़ा बनकर कसक रहा है?
और क्या मैं गले लगा पाई उन्हें
जो विपदा में मेरे साथ खड़े रहे, छाया बनकर?
या मेरी अपूर्णता का भय ही,
उनकी आत्मीयता को भी, मौन अस्वीकार दे गया?
ये अंतस नहीं, एक जीर्ण काल-कोठरी है,
जहाँ हर भावना, हर टीस का हिसाब रखा है।
यहाँ जमे हैं वो टूटे हुए काँच के टुकड़े,
जिनमें अतीत का हर चेहरा विकृत दिखता है।
अपने क्षतिग्रस्त पंखों पर सबसे तीखी चुभन,
एक अनबुझा, असहनीय सत्य है।
उन चेहरों की याद, जिन्होंने छल रचा,
जो मेरे विश्वास की नींव पर खड़े होकर मुस्कुराते रहे,
और मैंने... मैंने एक शब्द भी न कहा।
मेरा मौन, मेरी हार नहीं थी, वह मेरी अंतिम शक्ति थी।
वह चुप्पी, मेरे भीतर का सबसे बड़ा विस्मय है।
वह क्षण था, जब मेरे होंठों पर शब्द जम गए,
सिर्फ़ इसलिए नहीं कि मैं विवश थी
बल्कि इसलिए, कि मैंने जान लिया था
कुछ छल इतने गहरे होते हैं,
कि उन्हें शब्दों का नहीं, केवल समय का न्याय चाहिए।
मैंने उन्हें उत्तर में, अपना अखंड विश्वास भेंट किया।
क्योंकि मैंने तय किया,
मेरा चरित्र-बल, उनके कर्मों से छोटा नहीं हो सकता।
यह चुप्पी, उस क्षण की गवाही है,
जब मैंने अपनी आत्मा को उनके विष से बचा लिया।
मैंने क्रोध की ज्वाला को पीकर, उसे शीतलता दी।
मेरा मौन, एक प्रार्थना बन गया
उनके लिए नहीं, जिन्होंने मुझे आघात पहुँचाया,
बल्कि उस लड़की के लिए, जो टूटने के बाद भी
प्रेम करने का साहस नहीं छोड़ना चाहती।
छल की लकीरें उनके हाथों पर खिंचीं,
और मैंने अपने हृदय पर, धैर्य का शिलालेख उकेर लिया।
क्षमा एक आग है, जो या तो सब जलाकर भस्म कर दे,
या लोहे को तपाकर कुंदन बना दे।
आज मैं माफ़ करती हूँ पहले स्वयं को,
और फिर उन्हें, जो अनजाने में ही सही,
मेरे मज़बूत निर्माण का कारण बन गए।
यह अंतस मेरा विश्रामस्थल है,
मेरा महासागर—अथाह, गहरा, और शांत।
मैं स्वयं में ही पूर्ण हूँ, यह सत्य मैंने आज पाया है।
मैं वह हूँ जो गिरकर उठी, जो टूटने पर भी गाई।
यह मेरा भीतर का ब्रह्मांड है, मेरा अनंत,
जहाँ मैं टूटकर जुड़ती हूँ, और फिर बढ़ती हूँ, सतत।
और यही मेरे होने का सबसे गहरा अर्थ है।
शुचि मिश्रा
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