ऋण-बोध

वह कोई महाकाव्य नहीं थी जिसे सस्वर पढ़ा जाता,
वह तो घर के पुराने संदूक में दबी एक मूक वसीयत थी।
विदाई के समय उसकी आँखों से आँसू नहीं, 'ग्लानि' बही थी,
क्योंकि उसे घुट्टी में ही मितव्ययिता का पाठ पढ़ाया गया था,
आँखों का पानी हो या पिता की पूँजी, व्यर्थ नहीं बहनी चाहिए।

उसके बटुए में मुद्रा से पहले हमेशा एक संचित संकोच भरा रहा,
उसे पता था कि उसकी हँसी, पिता के सम्मान की दहलीज़ लाँघ सकती है।
उसके कंधों पर उत्तरदायित्व, दुपट्टे की सिलवटों सा अस्थाई नहीं,
बल्कि किसी अदृश्य कूबड़ की तरह उसकी नियति थी।
बाज़ार के कौतुक और स्वप्नों के उत्तुंग बुर्जों के बीच,
उसने सदैव 'न्यूनतम' को ही अपना 'श्रेष्ठतम' माना।
उसने अपने फटे होंठों की दरारों को कभी किसी रंग से नहीं भरा,
क्योंकि उसे ज्ञात था कि महँगी साड़ियों का मोह और
अत्यधिक दीप्तिमान दिखने का अधिकार उसकी सीमाओं में नहीं था।

उसने कभी किसी रेस्तरां की मेज़ पर अपनी क्लान्ति नहीं छोड़ी,
ना ही अट्टालिकाओं के काँच में अपने वजूद को ढूँढा।
ना ढेरों सखियाँ थीं, ना रक्ताभ गुलाबों से कोई नाता,
ना प्रेम-पत्र की स्याही में उसने स्वयं को घोला।
उसने हताशा की मूसलाधार वृष्टि में बार-बार भीगना स्वीकार किया,
किंतु 'विद्रोह' का सोपान कभी नहीं चढ़ी।
उसने आत्महत्या तक नहीं की, क्योंकि वह जानती थी
कि एक बोझ का मर जाना भी व्यवस्था पर एक नया बोझ ही होगा।

जब अज्ञात रास्तों पर चलने के लिए उसका हाथ सौंपा गया,
तो परंपराओं के सम्मुख वह एक 'मौन समर्पण' बनी रही।
आधी उम्र ससुराल की देहलियों को सौंपने के बाद,
जब वह ढलती दोपहर की भस्म जैसी धूप में बैठती है,
तो चाय की प्याली के धुएँ में उसे अपना चेहरा नहीं दिखता।
वहाँ आमोद-प्रमोद के दृश्य नहीं, ना उल्लास की कोई प्रतिध्वनि है,
वहाँ उभरती हैं माँ की घिसी हुई एड़ियाँ और पिता का पुरातन सन्नाटा।

उसने कभी नहीं चाहा कि उसका जन्म-दिवस एक उत्सव बने,
वह अस्तित्व से अधिक घर की 'अपरिहार्य आवश्यकता' बनना चाहती थी।
उसकी व्याधि की आहट तब तक किसी को सुनाई न दी,
जब तक कि उसकी देह एक जीर्ण-शीर्ण बिछौना न बन गई,
क्योंकि जिसे 'भार' होने का बोध विरासत में मिला हो,
वह अपनी व्यथा से दूसरों के मन को बोझिल कैसे कर सकती थी?

उसने मन के हारे हार मान ली थी,
क्योंकि उसकी विजय की परिभाषा ही स्वयं का 'विलय' था।
वे स्त्रियाँ जो आज भी जीवित हैं पर जीती नहीं,
वे उस सामाजिक रिक्तता की ही उपज हैं,
जहाँ एक बेटी को घर का 'उपहार' नहीं,
बल्कि एक दीर्घकालिक 'उधार' की तरह पाला गया

शुचि मिश्रा

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