इतना पारभासी
कि मुझमें झाँकने वाली हर कुटिल आँख,
परछाईं नहीं, अपना वास्तविक चेहरा देख सके।
मुझे पाषाण नहीं, ओस का वह अणु बनाओ
जो अपनी तरलता से
हठ की सबसे संकरी दरारों में सत्य भर दे।
मुझे वह अनंत शून्य बनाओ
जिससे टकराकर दंभ का हर गणित
स्वयं के ही विरुद्ध खड़ा हो जाए।
इतनी अगाध करो मेरी विनम्रता
कि जब कोई आए आस्तीन में प्रतिशोध दबाए,
तो मेरे झुकते ही
उसका अहं काँप उठे
और उसकी घृणा मेरे ललाट की आभा में
नमक के एक ढेले सी विलीन हो जाए।
जब वह प्रहार करे मेरी रूह पर
तो उसे रक्त की एक बूंद भी न मिले,
बल्कि वह 'क्षमस्व' के उस महासागर में डूब जाए
जहाँ पहुँचकर हर हिंसा पश्चाताप बन जाती है।
ईश्वर, मुझे इतना रिक्त और निहत्था करो
कि मेरी हत्या का स्वप्न देखने वाला हाथ,
मेरी आँखों की असीम करुणा में
स्वयं अपनी ही नज़रों में लहूलुहान हो जाए।
मेरी परिपूर्ण पराजय ही
उसकी सबसे आत्मघाती और अंतिम हार हो।
शुचि मिश्रा
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