ये कैसा हैं नियम हैं ये कैसा संविधान, क्यों इस देश में सस्ती हैं बेटियों की इज़्ज़त गरीबों की जान। एक ओर कहता है भारत का यह संविधान,
सब नागरिक का अधिकार हैं एक समान।
फिर जाति ऊँची, नीच हुई ये कैसे, जब सबका अधिकार हैं, हैं सबका सम्मान।
**अनुच्छेद चौदह** देता हैं इस बात की हमें गवाही,
कानून की नजर में बराबरी आई।
पर काग़ज़ से बाहर निकलते ही तवाही,
तो न्याय की रेखाएँ क्यों जनता को गहरी दिखाई?
फिर जाति के नाम पर बाँटे सब अपना-अपना हक़,
न जाने किसकी कलम से आरक्षण की खिंच गई लकीर।
जिस भेद को खत्म करके असमानता को मिटाना था,
उसी को ही मिल गया दुश्मनों के हाथों एक नया तीर।
एक हाथ जोड़े एकता का गीत
दूजा बाँटे वर्गों की रीत।
मुझसे पूछे मन मेरा—यह कैसा न्याय?
कैसा हैं ये समरस भारत का प्रीत?
कहा गया था—यह अस्थायी है एक दिन समता आएगी पूर्ण।
पर पीढ़ियाँ बीत गईं देखते
अस्थायी बना ना स्थायी संपूर्ण।
योग्यता खड़ी सवालों में मेहनत पूछे—मेरा क्या हैं दोष?
पहचान से पहले इंसान न देखो,
तो कैसे मिटे भेद का ये रोष?
यह कहना भी अधूरा सच होगा कि समस्या सरल सीधी है।
इतिहास की चोटें गहरी हैं पीड़ा अब भी जीवित सी है।
पर कब तक बांटे जाएंगे जाति से कब हक में न्याय मिलेगा ?
कब इंसान में इंसान को इंसानियत दिखेगा?
संविधान अगर जीवित ग्रंथ है,
तो क्या यह प्रश्न भी उसमें लिखे?
न विरोध यह, न अवमानना यह तो एक नागरिक का प्रश्न ?हैं। मैं लहरा दूं आसमां में तिरंगा लेकिन क्या यहीं गणतंत्रा का जश्न हैं ?
कानून बराबरी की बात करे पर न्याय क्यों बहुमूल्य है?
तारीख़ों में उलझा आम आदमी का जीवन पशु तुल्य हैं।
संविधान कहे—मैं हूं सबका पर सुनता किसकी आवाज़?
कमज़ोर पुकारे सदियों से मजबूतों का चलता राज।
जिस दिन जाति नहीं पहचान बने
मेहनत होगी असली मान।
उस दिन संविधान कह सकेगा—
हाँ, पूरा हुआ मेरा सम्मान।
लेखिका काजल कुमारी पटना बिहार
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